Archives for category: Religion; Chain of Mankind

How desperate is the ruling class?
Fake news, fake photoshops, fake data, fake ego boosting materials, fake nationalism, fake religion (Religion, itself, is based on fake concept of god), adulterated food & medicines, fake companies, fake education & certificates, fake religious & cultural gurus/charlatans have flooded the electronic & social media.
But why? The ruling class (the big capitalists and its state in its service) is unable to exploit the mass, run the show in previous, relatively calm times. It is forced to rule and suppress the working class, peasants, who are rising to demand job and a worthy life.
And what is the reality? Rising unemployment, inflation, crime & corruption, hatred among the communities. On global scale, rising terrorism and war, in addition to what we see in our own country.
Present economic, political, social order has reached a dead end. There is no road further, except the destruction of the productive forces (the engine of any progress of the mankind, the engine of creation of social wealth, from needle, to grains to ships & space crafts).
There are two paths here onwards for you and the mankind. Join the road of massive destruction, riding on hatred, paid political agents/managers & goons, corporate’s media, foreign secret agencies, like CIA/Mossad/MI6, Billion worth black money. This has already converted at least one Billion Earthians as non-human-entity; living creatures on road, streets, without clothes/food/voting cards/identity proofs. Such non-human-entity, beggars are visible in every city/village of India, in every market, at the door of every place of worship!
Second is known to you. Socialist Bhagat Singh and his ideology, with all its addition, enrichments, lessons which was gained in Soviet and struggle of the exploited class, world over!
There is no third alternate. Those who say, third alternative exists, like reform in present economic, political, social system are part of same bourgeois class, befooling the mass, trying to buy time for the revolt of mass to subside.
Unite against all forms of Right Ideology, against all forms of injustice and exploitation, unite & prepare for the impending revolution, to ensure the victory of the revolution, to establish a real people’s democracy!


Pope Francis: “Terrorism grows when there is no other option, and as long as the world economy has at its center the god of money and not the person.” “This is fundamental terrorism, against all humanity,”
From the post:

Partially may be right but here terrorism is being created by the American hegemony to control the world natural resources, suppress the opposition! Terrorism is a business with a very high rate of profit! The lobby of arm producers, dealers, their controlled media work day & night to open new fronts to make Billions worth business!
Main question is Capitalism, the last form of society based on class division, which is ruining the humanity itself! Even Dalai Lama and many other religious leaders do talk of ‘evil’ capitalism and ‘good’ communism! Is this a fashion or a ploy to keep their ‘flocks’ tied to their capitalist side?? Other wise their own hegemony or a high position will be lost for ever.
One thing is sure, they are not for end of capitalism, not for socialism, based on historical materialism! It has to be the working class and other oppressed class, natural allies, to overthrow the absurd form of ownership of means of production and the profit accrued then after, where the production itself is social!

साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहत है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालाँकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।

तो क्या भाषा का अन्तर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रान्त में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमाप्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहाँ का मुसलमान।

फिर क्या पहनावे में अन्तर है? सीमाप्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढ़नी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बाँधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइये, वहाँ हिन्दू और मुसलमान स्त्रियाँ दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।

खान-पान को लीजिए। अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊँचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊँचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हाँ कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हाँ, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियाँ मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहाँ तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अन्तर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?

संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहाँ भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियाँ दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को।

फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे।

इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।

मुसलमान अगर शासकों का दामन पकड़कर कुछ रियायतें पा गया है तो हिन्दु क्यों न सरकार का दामन पकड़ें और क्यों न मुसलमानों की भाँति सुख़र्रू बन जायें। यही उनकी मनोवृत्ति है। कोई ऐसा काम सोच निकालना जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों एक राष्ट्र का उद्धार कर सकें, उनकी विचार शक्ति से बाहर है। दोनों ही साम्प्रदायिक संस्थाएँ मध्यवर्ग के धनिकों, ज़मींदारों, ओहदेदारों और पदलोलुपों की हैं। उनका कार्यक्षेत्र अपने समुदाय के लिए ऐसे अवसर प्राप्त करना है, जिससे वह जनता पर शासन कर सकें, जनता पर आर्थिक और व्यावसायिक प्रभुत्व जमा सकें। साधारण जनता के सुख-दुख से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। अगर सरकार की किसी नीति से जनता को कुछ लाभ होने की आशा है और इन समुदायों को कुछ क्षति पहुँचने का भय है, तो वे तुरन्त उसका विरोध करने को तैयार हो जायेंगे। अगर और ज़्यादा गहराई तक जायें तो हमें इन संस्थाओं में अधिकांश ऐसे सज्जन मिलेंगे जिनका कोई न कोई निजी हित लगा हुआ है। और कुछ न सही तो हुक्काम के बंगलों पर उनकी रसोई ही सरल हो जाती है। एक विचित्र बात है कि इन सज्जनों की अफसरों की निगाह में बड़ी इज्जत है, इनकी वे बड़ी ख़ातिर करते हैं।

इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे समझते हैं, ऐसों पर ही उनका प्रभुत्व टिका हुआ है। आपस में खूब लड़े जाओ, खूब एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाये जाओ। उनके पास फरियाद लिये जाओ, फिर उन्हें किसका नाम है, वे अमर हैं। मजा यह है कि बाजों ने यह पाखण्ड फैलाना भी शुरू कर दिया है कि हिन्दू अपने बूते पर स्वराज प्राप्त कर सकते है। इतिहास से उसके उदाहरण भी दिये जाते हैं। इस तरह की गलतहमियाँ फैला कर इसके सिवा कि मुसलमानों में और ज़्यादा बदगुमानी फैले और कोई नतीजा नहीं निकल सकता। अगर कोई ज़माना था, तो कोई ऐसा काल भी था, जब हिन्दुओं के ज़माने में मुसलमानों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था, उन ज़मानों को भूल जाइये। वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जायेगा। यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटाई जा सके। जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।

उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी जो, राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। उसे आज अपने जीवन की रक्षा की ज़्यादा चिन्ता है, जो संस्कृति की रक्षा से कहीं आवश्यक है। उस पुरान संस्कृति में उसके लिए मोह का कोई कारण नहीं है। और साम्प्रदायिकता उसकी आर्थिक समस्याओं की तरफ से आँखें बन्द किये हुए ऐसे कार्यक्रम पर चल रही है, जिससे उसकी पराधीनता चिरस्थायी बनी रहेगी।

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‘आह्वान’ ज़िन्दगी के इस दमघोंटू माहौल को बदलने के लिए तमाम ज़िन्दा लोगों का आह्वान करता है। यह उन सभी का आह्वान करता है जो सही मायने में नौजवान हैं। जिनमें व्यक्तिगत स्वार्थ, कायरता, दुनियादारी, धन लिप्सा, कैरियरवाद और पद-ओहदे-हैसियत-मान्यता की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा के ख़िलाफ़ लड़ने का माद्दा और ज़िद है, जिनकी रगों में उष्ण रक्त प्रवाहित हो रहा है। जो न्याय, सौन्दर्य, प्रगति और शौर्य के पुजारी हैं। ‘आह्वान’ जनता की सेवा में लग जाने के लिए, मेहनतकश अवाम में घुलमिलकर उसकी मुक्ति का परचम थाम लेने के लिए ऐसे ही नौजवानों का आह्वान करता है। सामाजिक क्रान्तियों की कठिन शुरुआत की चुनौतियों को स्वीकारने के लिए पहले जनता के बहादुर युवा सपूत ही आगे आते हैं। इतिहास के रथ के पहिए नौजवानों के उष्ण रक्त से लथपथ हुआ करते हैं।

रोहित वेमुला के आत्म हत्या के बाद, समाज में एक ‘नयी’ विचारधारा आई है! वामपंथियों और दलितों का सहयोग और एकता! जे एन यु प्रकरण में यह ‘प्रयोग’ दिखा! भाजपा की बेचैनी समझ में आती है!

वामपंथी शुरू से ही दलितों, अल्प संख्यकों के साथ हैं! पर हर बार देखा गया है, समर्थन में क्रन्तिकारी विचारधारा का ह्रास!
वाम यानि मजदुर वर्ग की पार्टी! पूंजीवाद को हटाकर समाजवाद लाने वाली पार्टी! निजी पूंजी पर आधारित उत्पादन का ध्वंस! रास्ता मजदुर वर्ग का अधिनायकत्व! वर्ग समाप्ति कर वर्ग विहीन समाज की स्थापना, किसी भी वर्ग का दुसरे वर्ग पर अधिनायकत्व की समाप्ति! मानव द्वारा मानव का शोषण ख़त्म!
स्वतंत्रता के बाद, खासकर स्टॅलिन के मृत्यु के बाद, भारत कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय प्रजातंत्र को मजबूत करने का काम किया, चुनाव जितना मकसद बन गया! जो रास्ता था, वह लक्ष्य बन गया! धार्मिक, जाति शोषण का विरोध करते करते, उसका उपयोग चुनाव जितने में करने लगे! कोंग्रेस या कई भारी मौकापरस्त छेत्रिय दल भी प्यारे हो गए! अभी बंगाल का चुनाव उदहारण है!
जय भीम लाल सलाम आन्दोलन, आंबेडकर के उन मान्यताओं को लेकर चलता है, जो नारे के रूप में वाम के लिए भी प्रिय है! नेस्तनाबूद करने की बात करते हैं दलित नेता; जाति, धर्म और पूंजीवाद का! मायावती ने ज्यादा वक्त नहीं लिया वाम के ‘इस चाल’ को और व्यक्तव्य दिया, दलित आन्दोलन साम्यवाद के लिए नहीं हैं!
माना, वाम पंथियों के लक्ष्य मायावती या और कोई दलित नेता नहीं हैं, पर क्या दलित साम्यवादी क्रांति के लिए तैयार हैं?
आगे बढ़ने से पहले यह बताना आवश्यक होगा कि, दलितों का पूरी तरह से  सर्वहाराकरण हो चूका है! उनमे बहुत कम ही पूंजीपति या बहुत धनि हैं, पर उनके नेता बुर्जुआ वर्ग के चाकरी में व्यस्त हैं और एक बहुत ही सुविधा भरी जीवन जी रहे हैं! हाँ, दलित मजदूरों का सामाजिक और जातिय शोषण और प्रतारणा जारी है और पूंजीवाद के संकट में बढ़ता ही जा रहा है!
मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में क्रांति! क्यूंकि वह समाज का सबसे अग्रणी वर्ग है और छमता है क्रांति करने का! वह समाज में भारी बहुमत में है, किसान स्वाभाविक रूप से उसके साथ में हैं! “मजदुर वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, बल्कि जंजीर है!”
जय भीम लाल सलाम! यदि वाम दलितों के पास जाता है, क्यूंकि वह मजदुर हैं तो फिर बात अलग है, क्रांतिकारी कदम हो सकता है! पर दलितों के ‘विचारधारा’, जो आर्थिक मांग के साथ सामाजिक बराबरी की बात करता है, सत्ता में हिस्सा लेने की बात करता है और राजनितिक क्रांति को नजर अंदाज करता है, तो इतिहास गवाह है, वाम का ही छरण होगा!
अभी फासीवाद बढ़ रहा है! भारत में आर एस एस के नेत्रित्व में और दुनिया में बाकि जगहों में! फासीवाद का नंगा रूप युक्रेन, अमेरिका में दिख रहा है! आतंकवाद भी चरम है, जो पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ही देन है!
ऐसे समय एक बृहद राष्ट्रिय संधि आवश्यक होगा! हर प्रगतिशील संगठन इसका हिस्सा हो सकता है! यह आन्दोलन एक महत्वपूर्ण सहयोग कर सकता है! आर एस एस का रवैया दलितों के प्रति जग जाहिर है!
फासीवाद, यानि पूंजीवाद का ही एक रूप, 2008 के बाद पूंजीपतियों के लिए आवश्यक हो गया! अमेरिका में बैंक घेरो, यूरोप के मजदूरों का भारी विरोध, अविकसित देशों और चीन में भी असर ने पूंजी के चाकरों और ‘विद्वानों’ को समझ में आया की अभी ‘प्रजातान्त्रिक’ तरीके सफल नहीं होंगे मजदुर वर्ग के विरोध को दबाने में! इसके पहले क्रांति आगे बढे, इसे तोड़ना होगा और धर्म, जाति, देश, व्यक्ति पूजा, आदि का भरपूर इस्तेमाल करना होगा! घटते मुनाफा और मुनाफा दर को बढ़ाना होगा!
आवश्यक है वाम नेत्रित्व को, की हर प्रगतिशील और क्रांतिकारी समूह को संगठित करें, मजदुर वर्ग के नेत्रित्व में  पूंजीवाद का विरोध करे और क्रांति की तैयारी  रखें, मौका कभी भी मिल सकता है! दलित पीड़ित हैं, पर सर्वहारा क्रांति से अलग लडाई केवल बुर्जुआ ‘सुधार’ का ही हिस्सा बन जायेगा और शोषण और गहन होगा!
Himanshu Kumar
एक पेड़ पर बहुत सारे बन्दर रहते थे

फलदार शाखाओं पर मोटे और ताकतवर बंदरों नें कब्ज़ा कर लिया था
बाकी के बंदर कमज़ोर और बेआवाज़ हो गए थे
कमज़ोर बंदरों में नयी पीढ़ी आयी
उन्होंने कहा कि पेड़ के फलों के खाने में बराबरी होनी चाहिये
मोटे बंदरों में बैचैनी फ़ैल गयी
उन्होंने कहना शुरू किया कि ये फलों में बंटवारे की बात करने वाले कम्युनिस्ट बंदर हैं हैं
और कम्युनिस्ट बंदर देशद्रोही होते हैं
मोटे बंदरों नें कहा कि फलदार शाखों पर वही कब्ज़ा करेगा जो पेड़ माता की जय बोलेगा
कमज़ोर बंदरों नें कहा कि मुद्दा पेड़ माता की जय का है ही नहीं
मुद्दा है कि सारे बंदर बराबर फल खायेंगे या नहीं
लेकिन मोटे वाले बंदर पेड़ माता की जय – पेड़ माता की जय का शोर मचाने लगे
और फलों के बराबर बंटवारे की मांग पर से सबका ध्यान हटा दिया
लेकिन फलों के बराबर बंटवारे की की मांग लगातार बढ़ती जा रही थी!!


Police officer Aziz Cheema told reporters he had said in his report that no evidence was found that Draz committed “treason”.
Further, the working class, peasants of Pakistan must understand that the present constitution is extension of imperialist UK and that is meant to look after the propertied class and not them!
Unite to overthrow present rule of capital, religious rogues for a real people’s democracy, where there is no need of law of sedation, forced by earlier master British, no religiosity, no national chauvinism, in name of opposing India!
Don’t get divided by the parasites, filthy criminals & corrupts, who are ruling you, due your ignorance & disunity! #Socialism
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गीता प्रेस – धार्मिक सदाचार व अध्यात्म की आड़ में मेहनत की लूट
धर्म बहुत लम्बे समय से अनैतिकता, अपराध, लूट व शोषण की आड़ बनता रहा है। परन्तु मौजूदा समय में गलाजत, सड़ान्ध इतने घृणास्पद स्तर पर पहुँच चुकी है कि धर्म की आड़ से गन्दगी पके फोड़े की पीप की तरह बाहर आ रही है। आसाराम, रामपाल जैसे इसके कुछ प्रातिनिधिक उदाहरण हैं। इसी कड़ी में धर्म और अध्यात्म की रोशनी में मज़दूरों की मेहनत की निर्लज्ज लूट का ताज़ा उदाहरण गीता प्रेस, गोरखपुर है। कहने को तो गीता प्रेस से छपी किताबें धार्मिक सदाचार, नैतिकता, मानवता आदि की बातें करती हैं, लेकिन गीता-प्रेस में हड्डियाँ गलाने वाले मज़दूरों का ख़ून निचोड़कर सिक्का ढालने के काम में गीता प्रेस के प्रबन्धन ने सारे सदाचार, नैतिकता और मानवता की धज्जियाँ उड़ाकर रख दिया है। संविधान और श्रम कानून भी जो हक मज़दूरों को देते हैं वह भी गीता प्रेस के मज़दूरों को हासिल नहीं है! क्या इत्तेफ़ाक है कि गीता का जाप करनेवाली मोदी सरकार भी सारे श्रम कानूनों को मालिकों के हित में बदलने में लगी है। इसी माह प्रबन्धन के अनाचार, शोषण को सहते-सहते जब मज़दूरों का धैर्य जवाब दे गया तो उनका असन्तोष फूटकर सड़कों पर आ गया।