शहीदे आज़म भगतसिंह के 109वें जन्‍मदिवस के अवसर पर।

हमें तुम्हारा नाम लेना है

एक बार फ़िर

गुमनाम मंसूबों की शिनाख़्त करते हुए

कुछ गुमशुदा साहसिक योजनाओं के पते ढूँढ़ते हुए

जहाँ रोटियों पर माँओं के दूध से

अदृश्य अक्षरों में लिखे

पत्र भेजे जाने वाले हैं, खेतों-कारख़ानों में

दिहाड़ी पर खटने वाले पच्चीस करोड़ मज़दूरों,

बीस करोड़ युवा बेकारों,

उजड़े बेघरों और गिरफ़्तार आधे आसमान

की ओर से

उन्हें एक दर्पण, नीले पानी की एक स्वच्छ झील,

एक आग लगा जंगल और धरती के बेचैन गर्भ से

ऊनने को आतुर लावे की पुकार चाहिए।

गंतव्य तक पहुँचकर

अदृश्य अक्षर चमक उठेंगे लाल टहकदार

और तय है कि

लोग एक बार फ़िर इंसानियत की रूह में

हरकत पैदा करने के बारे में सोचने लगेंगे।

(शशि प्रकाश, ‘नई सदी में भगतसिंह की स्मृति’ से)

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