कॉमरेड संजीव द्वारा

मित्रों आज जनकवि रमाशंकर यादव ‘ विद्रोही ‘ का निधन हो गया . विद्रोही जी की कविता पंक्तियों के साथ दो यू ट्यूब की लिंक दे रहा हूँ .. इन्हें अवश्य देखें … आपने ऐसा कवि नहीं देखा होगा जिसे अपनी सारी लम्बी लम्बी कवितायेँ याद हों , आज सुबह विद्रोही जी चले गए .. फक्कड़ आदमी थे , फक्कड़ की तरह चले गए . क्या पता क्या हुआ , ठण्ड इतनी थी , न कुछ ओढ़ते थे , न ढंग से कुछ पहनते थे , न खाते थे .. मुझे बार बार लगता है कि उनके साथियों को उन्हें सहेज कर रखना था , लेकिन वे उन्हें नहीं रख पाए .

🔥 विद्रोही जी कविता से कुछ पंक्तियाँ 🔥

.” कुछ औरतें अपनी इच्छा से कुँए में कूद कर जान दी थीं
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है
कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है
मैं कवि हूँ ! करता हूँ ..क्या जल्दी है
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को
एक ही साथ औरतों की अदालत में तलब कर दूंगा ”
सलाम सलाम …जनकवि विद्रोही .. लाखों सलाम

” मेरी नानी की देह ,देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी
पामीर की पठार की तरह समतल पीठ वाली मेरी नानी
जब कोई चीज़ उठाने के लिए ज़मीं पर झुकती थी
तो लगता था जैसे बाल्कन झील में काकेशस की पहाड़ी झुक गयी हो
जब घर से बाहर निकलती थी तो लगता था जैसे हिमालय से गंगा निकल रही हो ”

🙏🏼सलाम कामरेड विद्रोही ….🙏🏼

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