कार्ल मार्क्स ने अपने सिद्धांतो में एक बहुत रोचक कांसेप्ट की ओर इशारा किया है. अक्सर ही इस कांसेप्ट को वर्ग चेतना और राजनीतिक या अधिक से अधिक सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखा जाता है. यह कांसेप्ट है “क्षद्म चेतना” यानी “फाल्स कांशसनेस”.

बहुत सरल शब्दों में कहें तो शोषित और गरीब व्यक्ति की चेतना को शोषक सत्ता द्वारा इस तरह से ढाल दिया जाता है कि वह स्वयं ही शोषण के ढाँचे को सहारा देना शुरू कर देता है. फिर इससे भी आगे बढ़कर वही गरीब आदमी उस ढाँचे के बनावटी दर्शन में ही अपने लिए सुरक्षा, सम्मान और आश्वासन ढूँढने लगता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है आज के भारत में दलितों में ब्राह्मणवादी धर्म के प्रति बना हुआ सम्मोहन. वे जानते हैं कि उन्हें मंदिरों में नहीं घुसने दिया जाता है. उनका कहीं कोई सम्मान नही है फिर भी वे बहुत गहरे में उसी धर्म में उलझे रहते हैं जो उनकी छाया तक से नफरत करता है.

इसी तरह सभी धर्मों की स्त्रियाँ है, वे पित्रसत्तात्मक, पुरुषवादी और सामंतवादी संस्कारों को बनाए रखने में सबसे बडी भूमिका निभाती हैं. अकेला पुरुष अपने परिवार में इस ढाँचे को बनाए नहीं रख सकता. बच्चों में और परिवार के पूरे वातावरण में धर्म या देवी देवता या बाबाओं सहित पुरुष की श्रेष्ठता की धारणा को ज़िंदा रखना स्त्रीयों के सक्रिय सहयोग के बिना संभव ही नहीं है. गौर से देखें तो ये बहुत अजीब और डरावनी बात है. ये बहुत बड़ा सवाल है कि भारत के दलित या सब धर्मों की स्त्रीयां अपनी ही बर्बादी में इतना निवेश क्यों करते/करती हैं?

यह बात तब तक नहीं समझी जा सकती जब तक कि मार्क्स की क्षद्म चेतना की धारणा को न समझा जाए. एक खालिस और अनकंडीशंड व्यक्ति में स्वयं के प्रति, स्वयं की समस्याओं के प्रति और उस समस्या के संभावित समाधान के प्रति एक साफ़ सोच और समझ होती है. मोटे अर्थों में इसे व्यक्ति की स्वयं के प्रति जागरूकता या चेतना कहा जा सकता है. जैसे एक खालिस गरीब यह देख पाता है कि मैं गरीब हूँ. लेकिन एक धार्मिक गरीब यह मानता है कि मैं अपने कर्मों के कारण ईश्वरीय विधान के कारण पाप का फल भोग रहा हूँ, यह भुगतान पूरा होते ही मेरे अच्छे दिन आ जायेंगे. इस तरह की सोच छद्म चेतना का कारनामा है. इस तरह वह गरीब आदमी गरीबी से लड़ने में ताकत लगाने की बजाय गरीबी को बनाए रखने वाले ढाँचे को बचाने रखने में अपनी ताकत लगाए रखता है.

एक आदमी या स्त्री की अपनी तटस्थ या अन कंडीशंड चेतना या जागरूकता ही असल में उसके ज़िंदा होने की या इंसान होने के नाते उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है. यह चेतना अगर साफ़ और स्पष्ट हो तो उसे अपने शोषण और उस शोषण के कारण व निवारण सहित शोषकों के षड्यंत्रों को समझने में ज़रा देर नहीं लगती. लेकिन शोषक सत्ताएं – चाहे वे धर्म हों या राजनीति- वे सबसे गहरा और सबसे पहला हमला यहीं करते हैं.

हर देश के बच्चों गरीबों और महिलाओं को बहुत शुरुआत से ही धर्म की गुलामी सिखाई जाती है. कुछ जाने पहचाने से चेहरों या सिद्धांतो में दिव्यता का आरोपण कर उनका आदर करना सिखाया जाता है. आप इनका जितना आदर करेंगे उतना आदर और सुरक्षा आपको मिलेगा. ये डील है. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है. इस सम्मान और सुरक्षा के बदले आपसे बहुत बड़ी कीमत माँगी जाती है. आपको शोषण के एक अनंत घनचक्कर में घूमना होता है जिसमे से कहीं कोई मुक्ति नहीं होती. इसलिए मुक्ति नहीं होती कि आपको खुद को ही इस शोषण के ढाँचे को बनाए रखने के लिए काम पर लगा दिया जाता है.

इस देश में स्त्रियों और दलित हजारों साल से इस धर्म के जुए को ढो रहे हैं. पोंगा पंडितों के पंडालों में गड्ढा खोदने वाले, टेंट लगाने वाले, बर्तन साफ करने वाले और सब तरह के श्रम करने वाले “स्वयं सेवकों” को गौर से देखिये. वे आधे से ज्यादा दलित ही हैं, आगे चलकर यही जुलूसों और दंगों में सबसे आगे धकेले जाते हैं. और इन बाबाओं की बकवास सुनकर ताली बजाने वाली भीड़ में भी अस्सी प्रतिशत से अधिक महिलायें ही मिलेंगी. उनमे भी आधी से अधिक दलित या शूद्र (ओबीसी) महिलायें होंगी.

अब मजा ये कि उनसे इस बारे में प्रश्न करो तो वे नाराज होते/होती हैं. उन्हें ये प्रश्न उनकी अपनी अस्मिता पर उठाये गए “गंदे प्रश्न” लगते हैं. उन्हें ज़रा भी एहसास नहीं होता कि उनके शत्रुओं ने उनको सम्मोहित करके छोड़ दिया है. इस सम्मोहन के कारण ही वे अपना और अपनी अगली पुश्तों का भविष्य पोंगा पंडितों और दंगाइयों के हाथों सौंप देते हैं.

यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे घातक खेल है. इसको आँख खोलकर जिस दिन महिलायें और दलित देख लेंगे उसी दिन उनके जीवन में क्रान्ति हो जाती है.

Sanjeev

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