वर्तमान हालात में ”फासीवाद विरोधी संघर्ष की सही कार्यनीति”  के प्रश्‍न पर चंत बाते
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”फासीवादी उभार और देश में इसकी पूर्ण विजय के आसन्‍न खतरों के खिलाफ भारत की जनता की लडाई की जीत की पहली गारंटी है – फासीवाद-विरोध को वर्ग-संघर्ष की जमीन पर खड़ा करते हुए मजदूर वर्ग और समस्‍त महतनकशों को फासीवाद विरोधी मोर्चे में संगठित करना और पूँजीवाद-फासीवाद के खिलाफ उनकी व्‍यापक लामबंदी करना।

परंतु सवाल है, देश में जनवादी, प्रगतिशील व क्रांतिकारी शक्तियों की आज की बंटी हुई स्थिति‍ में यह कार्यभार किस तरह संपन्‍न हो सकता है? एकमात्र इसी तरह कि ऐसी तमाम शक्तियाँ और कतारें एक ”गैरचुनावी फासीवाद विरोधी प्रोलितेरियन मोर्चे” में शामिल हों। आज की परिस्थिति में ऐसे मोर्चे का निर्माण, सुदृढ़ीकरण और विस्‍तारीकरण ही मजदूर वर्ग और समस्‍त महतनकशों को फासीवाद विरोधी मोर्चे में लामबंद करने की एकमात्र गारंटी है। यही एकमात्र रास्‍ता है।

अगर वर्ग-संघर्ष पर आधारित यह मोर्चा सुदृढ़ तौर पर आकार लेता है तो बड़ी पूँजी की प्राणांतक मार झेल रहे दूसरे (निम्‍नपूँजीवादी एंव मंझोले मिल्‍की) वर्गों व संस्‍तरों की लामबंदी भी आसान हो जाएगी। उन्‍हें यह समझाना व्‍यवहारिक तौर पर भी आसान हो जाएगा कि किस तरह फासीवाद बड़ी पूँजी की हत्‍यारी राजनीति व अर्थनीति का परिणाम है और क्‍यों बड़ी पूँजी के रहते यह खतरा बारंबार उपस्थित हो सकता है और होगा।

यहाँ तक कि हम फासीवाद विरोधी चंद बड़े बुर्जुआ् के विरोध को भी हम सर्वहारा की कार्यनीति के मातहत ‘सम्मिलित’ करके उसका उपयोग कर सकेंगे, खासकर दुश्‍मन यानि फासीवाद की समर्थक बड़ी पूँजी की कतारों को छिन्‍न-भिन्‍न करने की कार्यनीत के तहत। जाहिर है, हम सही कार्यनीति और मौजूं पहलकदमी के बल पर फासीवाद विरोधी छोटी-बड़ी हर ताकत को फासीवाद विरोधी प्रोलितेरियन मोर्चे के साथ चलने के लिए ”बाध्‍य” और प्रेरित दोनों कर सकते हैं। जाहिर है इसमें प्रमुख महत्‍व इस बात का है कि ठोस परिस्थिति‍ के ठोस मूल्‍यांकन के आधार पर और इसके तदनुरूप पहलकदमी ले सकते हैं या नहीं, हमारे में ऐसी हिम्‍मत है या नहीं। आज के अत्‍यंत बिखरे हुए हालात में यह प्रश्‍न सबसे बड़ा यक्ष बनकर खड़ा हो जाता है, हो जा रहा है। लेकिन हम अगर हिम्‍मत दिखाएं, तो चीजें पूरी तरह बदल सकती हैं जैसा कि हमें ठोस परिस्थितयों के वि‍श्‍लेषण से स्‍पष्‍ट दिख्‍ता है।

और तब निस्‍संदेह संशोधनवादी व नवसंशोधनवादी पार्टियों की कतारों को भी, जिन्‍हें अभी तक ऐसे मामलों में महज बुर्जुआ के पीछे-पीछे चलना सिखाया गया है, हम उन्‍हें भी फासीवाद विरोध की सच्‍ची यानि प्रोलितेरियन कार्यनीति के प्रति आकृष्‍ट करने में सफल हो पाएंगे, और वे व्‍यवहार में यह देखेंगे कि किस तरह सर्वहारा वर्गीय कार्यनीति हमें आगे-आगे चलना और परिस्थितयों का दास बनने के बजाए उसका नेतृत्‍व करना सि‍खाती है।

जाहिर है इसकी बढ़त न सिर्फ पूरे देश में जान वाद की परिस्थिति पैदा करेगी, अपितु देश में सच्‍ची भगत सिंह पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया को भी त्‍वरित करेगी, चाहे वह जहाँ भी और जिस रूप में भी आज चल रही है। यानि, हम न सिर्फ फासीवाद की पूर्ण विजय को बीच में रोक सकते हैं और इस तरह (फासीवाद विरोधी) लड़ाई में न सिर्फ हम उदार बुर्जुआ का नेतृत्‍व कर सकते हैं, अपतिु समाजवादी क्रांति के लक्ष्‍य के तरफ भी एक लंबी छलांग लगा सकते हैं। अगर परिस्थितियाँ अनुकूल रहीं, जिसके बारे में ठोस रूप से हम आज कुछ भी नहीं कह सकते हैं, तो हम स्‍वयं यह देख सकते हैं कि फासीवाद विरोधी लड़ाई और समाजवादी क्रांति की लड़ाई को हम न सिर्फ एक दूसरे का पूरक बना दे सकते हैं, अपितु हम अपने दोनों कार्यभारों को एक साथ पूरा भी कर सकते हैं।”

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