आदरणीय रविश जी, कई दिनों से आप और आपके साथ जो ऑन लाइन गुंडागर्दी हो रही है उस पर टिप्‍पणी करना चाहता था। लेकि‍न न जाने क्‍यों अपने आपको हमेशा रोकता रहा। लेकिन जब आपने यह लिखा कि – ”तटस्‍थ बन जाइए और किसी का फैन नहीं बनिये, फैन लोकतंत्र का नया गुंडा है” तो उसके बाद अपने आपको रोकना मुश्किल हो गया। इसी का परिणाम है यह खुली चिट्ठी। इस चिट्ठी में मैंने आपके लिए कुछ कड़वे शब्‍दों और तल्‍ख शैली का प्रयोग किया है और उम्‍मीद है आप बुरा नहीं मानेंगे।
सबसे पहले मैं आपको इस बात के लिए धन्‍यवाद देता हूँ कि आज जब 99 फीसदी पत्रकारिता (पत्रकार और मीडिया दोनों) पूँजी की चाकर बन चुकी है, आप एक हद तक तन कर खड़े हैं। कम से कम ऊपर से तो यही दिखाई देता है। आपने सरकारों को अनेक मुद्दों पर आईना दिखाया है, उन्‍हें कटघरे में खड़ा किया है और ताकतवर नेताओं तक के सामने कटु प्रश्‍नों की बौछार भी की है। यह सब सराहनीय है। आपने आम जनों, खासकर दिल्‍ली के इर्द-गिर्द के ऐश्‍वर्य से भरी चमचमाती दुनिया के पिछवाड़े में बद से बदतर जिंदगी जी रहे मजदूरों की सुध ली, उनकी दुर्दशा दिखाई, उनके घोर रूप से अंधकारमय जीवन को दुनिया को दिखाया और देश में हो रहे ‘विकास’ के चरित्र पर प्रश्‍न खड़े किए। इसके लिए हम आपको साधुवाद देना चाहते हैं। यह सच है कि पत्रकारिता में लगे अधिकांश लोग लगभग भूल ही चुके हैं कि इस देश में मजदूर वर्ग भी रहता है और अब तक जो भी विकास हुआ है उसमें सीधे तौर पर मजदूर वर्ग के खून और पसीने का योगदान है। आपने जो दिखाया है उससे कम से कम यह तो साबित हुआ ही है कि सरकार किस तरह विकास के असली नायकों को दोजख की जिंदगी नसीब करवा रही है। इसके लिए एक बार फिर से आपको धन्‍यवाद।
लेकिन रविश जी, इतने से तनिक भी ज्‍यादा प्रशंसा के आप हकदार नहीं है। इस फ्रंट पर आपकी पत्रकारिता इसलिए ज्‍यादा चमकदार दिखती है क्‍योंकि बाकी पत्रकारिता का समस्‍त क्षेत्र इस मायने में पूरा का पूरा बियावान और वीरान है। अन्‍यथा इसी भारत में आपसे भी सौ गुना ज्‍यादा प्रगतिशील, हिम्‍मती और क्रांतिकारी पत्रकार हुए हैं। उस परंपरा में देखें तो अभी भी आप मोती की खोज में समुद्र के किनारे महज पत्‍थरों को चुनने वाले व्‍यक्ति की तरह ही हैं, खासकर वैचारिक प्रतिबद्धता और वैज्ञानकि दृष्टिकोण के मामले में। …… यहाँ शायद मैं कुछ गलत कह गया हूँ। कम से कम आज के दिन तो यह स्‍पष्‍ट है कि आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक दृष्टि तो उस परंपरा की है ही नहीं जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। आप तो बिलकूल उलट बात कह रहे हैं। आप तो ”तटस्‍थता” की वकालत करते हैं, इसे अपना नारा बनाते हैं और जो तटस्‍थ नहीं हैं उन्‍हें आप लोकतंत्र का गुंडा कहते हैं। जाहिर है आपने ऑनलाइन सांप्रदायिक-फासीवादी गुंडों को उनकी औकात बतायी है यह सराहनीय है लेकिन आपने इससे जो निष्‍कर्ष निकाले हैं उससे पता चलता है कि आप या तो पूरी तरह ”कनफ्यूज्‍ड” हैं या फिर आप जानबूझ कर ”कनफ्यूज्‍ड” बन रहे हैं और रास्‍ता भटक चुके समाज को एक और चकमा देना चाहते हैं।
आप समाज को संबोधित करते हुए लिखते हैं – ”आप मीडिया के आज़ाद स्पेस के लिए बोलेंगे या नहीं? आप किसी पत्रकार के लिए आगे आएँगे या नहीं? पत्रकारों को ख़ासकर कई महिला पत्रकारों को गालियाँ दी गईं। ये कौन सा समाज है जो गालियों के गुंडाराज को स्वीकार कर रहा है।”
मेरा प्रश्‍न है : यह कौन रवि‍श कुमार है जो एक तरफ तटस्‍थ रहने की बात करता है और दूसरी तरफ समाज को इस बात के लिए लानत देता है कि वह गालियों के गुंडाराज को क्‍यों नहीं ललकारता है? रविश जी, क्‍या तटस्‍थ रहने वाला समाज कभी गालियों के गुंडाराज को ललकारता है? उलट के कहें तो, जो गालियों के गुंडाराज को ललकारेगा वह तटस्‍थ कैसे रहेगा? जो आजाद मीडिया के लिए लड़ेगा और अपना लहू बहाएगा, वह तटस्‍थ तो नहीं ही रहेगा, इसके विपरीत वह आजाद मानव के लिए भी उन तमाम शक्तियों के विरूद्ध युद्ध लड़ने की तैयारी करेगा, जो उसकी बेडि़याँ बन चुकी हैं। रवि‍श जी, कहीं आप इससे तो नहीं डरते हैं? कहीं आप यह तो नहीं सोचते हैं कि जो आपके लिए यानि आजाद मीडिया के लिए लड़े वह बाकी अन्‍य चीजों के लिए न लड़े? कहीं आप यह तो नहीं सोंचते हैं कि लोग बस आपके द्वारा दिखाई जा रही मजदूरों की कीड़े-मकोड़े वाली जिंदगी देखें, अफसोस करें, रोयें और आपको इसके लिए शाबाशी देते रहें लेकिन कुछ और नहीं करें? क्‍योंकि कुछ और करने के लिए उन्‍हें आजादी का दीवाना बनना होगा, क्रांति का दीवाना बनना होगा और एक सिद्धांत और वैज्ञानिक द़ष्‍टकोण को अपनाकर, नये विश्‍व दृष्टिकोण को अपनाकर उस पर न्‍योछावर होना होगा। सबसे बढ़कर हमें बदलाव और क्रांति के सिद्धांत पर अटल विश्‍वास करना होगा जो कि शायद आप नहीं चाहते हैं, क्‍योंकि आप तो हमें तटस्‍थ बनाने पर तुले हैं, बस यह चाहते हैं कि आजाद मीडिया के लिए लोग लड़ें।
रवि‍श जी, जब मजदूरों की जिंदगी पर आप रिपोर्ट पेश कर रहे थे, तो आपने एक बार भी यह बात कहने की जहमत या हिम्‍मत नहीं उठाई और न ही इसकी जांच पड़ताल करने की कोशिश की कि वे कौन असली लोग हैं जो मजदूरों की इस नारकीय जिंदगी के लिए जिम्‍मेवार हैं। आपकी ‘आजाद’ नजर बस उन गृह मालिकों तक गई जहाँ मजदूर रहते हैं, बहुत हुआ तो प्रशासन तक गयी जो मजदूरों के पक्ष से कोई कार्रवाई नहीं करता है, लेकिन आपने उस पूँजीपति वर्ग की तरफ एक बार भी उँगली नहीं उठाई जिसका मुलाजिम यह प्रशासन है और जिसका ही भाई-बंधु ये गृह मालिक हैं। पूरा संसदीय जनतंत्र, जो धनतंत्र पर आधारित है, इन्‍हीं पूँजीपतियों की जमींदारी है। पूँजी की बादशाहत के चिन्‍ह हर जगह मौजूद हैं। लेकिन आप उस पर कुछ भी नहीं बोलते। आपने यह तक नहीं कहा कि ये मजदूर ही सस्‍ते श्रम का वह कुंड हैं जिसके सहारे और जिसे नोच और निचोड़कर ”मेक इन इंडिया” की सफलता की डींगे हमारे देश का शासक वर्ग हांकता है। और जब बात ऐसी है तो फिर मजदूरों की ऐसी नारकीय जिंदगी के पीछे कौन लोग हैं और कौन सी राजनीति इसके लिए जिम्‍मेवार है एकदम साफ स्‍पष्‍ट है, लेकिन तब भी आप मजदूरों की जिंदगी को बदलने की क्रांतिकारी जद्दोजहद को देखने के बजाए, इस जद्दोजहद के गर्भ में पल रहे भावी वर्ग-संघर्ष की तूफानी हलचलों के तरफ अपनी नजर ले जाने के बजाए मजदूर की जिंदगी के बारे में बस रोने-धोने और इस मुद्दे पर बेकार की उलझन भरी बातों में आप स्‍वयं और समाज को फंसाए रखते हैं। क्‍या आप इतने अज्ञानी हैं कि आप यह नहीं समझते हैं कि पूँजीवाद में विकास का अर्थ मजदूरों और प्रत्‍यक्ष उत्‍पादकों का नहीं, पूँजी का अर्थात पूँजीपतियों का विकास होता है? क्‍या आप यह नहीं जानते हैं कि मजदूरों की बदहाल जिंदगी ही पूँजीपतियों के मुनाफे की कुंजी है? नहीं रविश जी, हम यह नहीं मान सकते हैं कि आप इतने अज्ञानी है कि आप इन चीजों को समझते ही नहीं हैं।
रविश जी, आपकी स्थिति यह है कि आप इससे ज्‍यादा बोल नहीं सकते हैं जितना बोल रहे हैं, इसलिए आपके रोने-धोने और सामान्‍य गुस्‍सा जाहिर करने के सीमित कार्यक्रम में ऐसा कुछ है नहीं जो उस व्‍यापक आबादी की वास्‍तविक मुक्ति के किसी काम आ सके। दूसरी तरफ आज भारत में ऐसी एक फासीवादी राजनीति उग चुकी है जिसके लोग आप जितना बोल रहे हैं उसे भी सुनने और सुनकर बर्दाश्‍त करने के लिए तैयार नहीं है। आपकी जुबान फासीवाद और उसकी जननी संकटग्रस्‍त पूँजीवाद पर उठेगी नहीं, और फासीवादी जमात और आंदोलन के लोग आपकी इत्‍ती से प्रगतिशील बातों को भी सहेंगे नहीं। यही आपकी वास्‍तविक स्थिति का अजीबोगरीब द्वंद्व है।
रविश जी, चीन की अर्थव्‍यवस्‍था में इधर तेज गिरावट आने के बाद जब हमारे देश में चीन से आगे बढ़ने या चीन की जगह लेने को लेकर बहस शुरू हुई तो आप अपने प्राईम टाइम प्रोग्राम की एक बहस के दौरान इस पर हामी भरते गए कि भारत के पास चीन की गिरती अर्थव्‍यवस्‍था का फायदा उठाने का अवसर है अर्थात चीन से भागते निवेशकों को हम भारत के तरफ लाने की कोशिश करनी चाहिए, क्‍योंकि हमारे पास सस्‍ती युवा शक्ति है जिसकी बूंद-बूंद निचोड़ लेने की लालच से कोई भी विदेशी निवेशक भागा-भागा भारत आना चाहेगा। रिवश जी, मुझे याद है इस पर आपने भी हामी भरी थी और कहा था – ”हाँ, यह तो बात है।” क्‍यों रविश जी, आपने क्‍यों हामी भरी थी? दरअसल यह उसी बात का परिणाम है जिसे मैंने ऊपर लिखा है। या तो आपमें वह हिम्‍मत नहीं है जो आप देश की मुख्‍यधारा की जनविरोधी आर्थिक सोंच पर सवाल खड़ा कर सकें या फिर आप उससे सहमत है। फिर मजदूरों की हालत पर आपकी चिकनी चुपड़ी बातों का और उस आपके रोने-धोने का मतलब भी स्‍पष्‍ट हो जाता है। और जब आपने यह लिख दिया कि ”तटस्‍थ बनि‍ये” तो उसके बाद आपकी समझ का दिवालियापन स्‍वयं ही जगजाहिर हो गया। शायद आपके आह्वान का मतलब यह है कि आप मजदूरों की हालत पर रोइए, छाती पीटिए लेकिन तटस्‍थ बने रहिए। वो सब कुछ जो आप दिखाते हैं बस उसे हम देखते रहें और मजदूर वर्ग पर दया भाव बनाए रखें लेकिन फिर भी तटस्‍थ बने रहें।
रविश जी, आप कहेंगे कि यह मेरी पत्रकारिता की आजादी है, तो हम यह कहेंगे और हम यह कहने के लिए बाध्‍य हैं अर्थात यह हमारी भी आजादी है कि हम यह कह सकें कि आपकी पत्रकारिता की ऐसी आजादी से भी उतरना ही खतरा है जितना कि उनसे जो आप पर गालियाँ बरसा रहे हैं और जो आपकी इत्‍ती सी बात भी सहन नहीं करते हैं। मैं उन्‍हें भी जानता हूँ कि वे कौन हैं और कहाँ से नाल-नाभिबद्ध हैं। और मैं अब आपको भी जानने लगता हूँ कि आप कौन हैं और आपकी प्रगतिशीलता और आजादी की आपकी परिभाषा की सीमा क्‍या है।
-अजय सर्वहारा

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